बुँद बुँद बारिश आती है
सबके लिए आनंद लाती है
इस आनंद में मै हूँ
सुबह सुबह सूरज की
उजली उजली किरण आती है
सबके लिए चेतना लाती है
इस चेतना में मै हूँ
शब्द शब्द का संगठन
भावनाओं की कहानी कहे
हर एक भावना में छुपी हुई
एक भावना मै हूँ
कवी हूँ मै
भावनाओं के सागर में रहती हूँ
कविता ही मेरा प्राण
कविता ही मेरा आत्मजागर
कविता ही मेरे दिल की खोज
शब्द और शब्द से जुडे
सुकून में मै हूँ
जब भी आये याद मेरी
इन शब्दों में मुझे ढुँढना
आमने सामने चाहे न मिल सकूँ
शब्दों की गहराईयों में मुझसे मिलना
शब्दों की कहानी, भावना की जुबानी
अरुप के रुप में मै हूँ
उम्र की दहलीज पर
सांझ कभी न आये
दिल के उजाले में मेरे
अंधेरा कभी न छाये
ढाई आखर प्रेम का और
आशिष सभी प्रियजनों का मिले
खुद ही से खुद ही यही दुवा माँगू
सदा सुख में हमेशा मै रहूँ
मृदुला मुकुंद पाटखेडकर
२ जुलै २०२१
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