रात भी बाकी
दिन भी बाकी
उजाले की ओर है आशा
रात में भी नहीं थी निराशा
मिठास में है अपनापन
जीवन में है नयापन
बाकी में है बात अधुरी
संपूर्णता से है अधुरी यारी
कहानीं यही है जिंदगी की सारी
दिन और रात हर हमेशा से ही
तराशते है जोहरी
रात भी बाकी
दिन भी बाकी
मृदुला मुकुंद पाटखेडकर
३१ जुलै २०२२













