Friday, 10 June 2022

वो एक बर्गत का पेड़

वो एक बर्गत का पेड़, अपनी मिट्टी से वफ़ा करता

न जाने कितनी पीढ़ियों से पकडे हुए अपनी जड़ों को, खड़ा था

धुप की चादर ओढ़े, बारिशों के थपेड़े सहता

अपने ही पत्तों की सरसराहट में झूम उठता

कितनी ही  शाखाये गिर पड़ी, कितने ही पत्ते मुर्झायें

न डरा कभी, डटा रहा बाहें फैलाये

उसकी छाँव तले सुकूँ बसता था

उसकी बाँहों में कईयों का डेरा था


अबकी बार जब दिखा लेकिन, मानो बूढ़ा लगने लगा था

शायद उसने अपने दर्द को जज्ब करके रख्खा था

शाखाये खुरदरी, पत्ते सारे मुरझाये

उसकी जाडी टहनियोंपर, अब घाव थे गहरे

उसमेसे टपकते आंसू , जरासिमों का खाना हैं 

देना ही जीवनधर्म हैं, मानो कहते हैं

बावजूद इसके खड़ा था,अपनी रूह को पकडे


काट डाला परसो, कुछ बेरहमोने उसे

अब वहाँ एक वीरान सन्नाटा है

कुछ सूखीं लकड़ियां पड़ी हैं, मानो अस्थियाँ जैसे

उसके न होनेसे एक खला सा हैं 

मानो जैसे जीनेका सहारा गिर पड़ा है


अमोल पाटखेड़कर

१०-जून-२०२२ 


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