Wednesday, 25 January 2023

क्रंदन

एक पटल विकार एक अविकार

दोनों की अपनी अपनी पहचान

दोनों असमंजस विरुद्ध

कौन तय करे कौन हैं बेक़सूर और कौन कसूरवार


(संदर्भ: यहाँ मनुष्य स्वभाव को पटल की उपमा दी हैं यह दर्शाने के लिए की मनुष्य भिन्न स्वभाव के होते हैं और उनकी अपनी अलग पहचान होती हैं. एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से मेल नहीं खाता - न रंग में, न रूप में, न स्वभाव में. कभी कभी मनुष्य अपने विचारों पर इतना अडिग होता हैं की उसको अन्य विचार सुनाई नहीं देते या उनको ग्रहण करने में वो असमंजसता दिखाता हैं. जो व्यक्ति हमारे विचारों से सहमत नहीं इसलिए वो बुरा हैं या जो हमारे विचारों से सहमत हैं इसलिए वो अच्छा हैं, ऐसा तय करना गलत हैं.)


मेरी करुणामय भावविभोर आवाज़े

क्षितिज से होके शुन्य से टकराके

तुम्हारे कानोंसे अनसुनी होके

आयी वापस लौट फेरा लेके


(संदर्भ: कभी कभी ऐसा भी होता हैं की जो बात हम दूसरों को समझाना चाहते हैं, उनके कानों तक तो पोहोचती हैं लेकिन बेअसर होकर दूसरे कान से निकल जाती हैं. माँ बाप छोटे बच्चों को जो समझाना चाहते हैं, वो बात बच्चे समझ नहीं पाते इस अर्थ से भी. जनरेशन गॅप की वजह से भी ऐसा होता हैं - यंग जनरेशन ओल्ड जनरेशन को सुनती नहीं हैं. जो आर्त पुकार भगवान् को हम लगाते हैं, वो भी सुनी नहीं जाती इस अर्थ से भी.)



ह्रदय में मेरे स्मृति की बस्ती

छलकाती आँसू कभी कभी 

नितल, निर्मल, बेरंग मेरे वो आँसू

लगते थे मगर तुम्हे मगरमच्छ के आँसू


(संदर्भ:एक मनुष्य दूसरे की भावनाये समझ नहीं पाता हैं और इसलिए उसे दूसरों की भावनाये झूटी या ड्रामा लगती हैं. इसका कारण हरएक की परिस्थिति, भावनाये और इमोशनल क्वोशन्ट अलग होता हैं. लोग एक ही परत या सेम वेवलेंग्थ पे नहीं होते हैं इसीलिए ऐसा होता हैं.)


शीतल ज्वाला को अनल बनाती मेरी गरम सांसे

जिसपर सपनों की रोटियां सेकी थी तुमने

डालकर जल; बुझा गयी मेरी, करुणार्द्र कहानी

मेरे करुणापटल पर अब बजती वीणा क्रंदन की


(संदर्भ: जो लोगों ने मुझे सीढी बनाके अपनी तरक्की की और फिर मुझे कचरा समझके त्याग दिया, ऐसे लोगों के बारे में सोचकर मेरा करूण ह्रदय रोता हैं, उनपर तरस खाता हैं.)


देता व्योम विस्तार, विस्तार व्योम तो नहीं

देता खुशबु मधुबन, मधुबन खुशबु तो नहीं

देती शीतलता कौमुदी, कौमुदी शीतलता तो नहीं 

देता मधुछत्ता मधुबुँदे, मधुबुँदे मधुछत्ता तो नहीं


(संदर्भ: जब मनुष्य ग़ुस्सेमे अनाब-शनाब बकता हैं तो क्या वो खुद अनाब-शनाब होता हैं? नहीं वो मनुष्य ही होता हैं. परिस्थिति के अनुसार हमारा बर्ताव बदलता हैं. इसका मतलब हम वो बर्ताव हैं ऐसा नहीं. किसी व्यक्ति को उसके कभी कभार किये हुए बर्ताव से पहचानना ये गलत हैं.किसी व्यक्ति को उसके बर्ताव के लिए जनम भर ताने मारना ये गलत हैं.  इससे बेहतर हैं की उस बर्ताव को भूल जाये मनुष्य को नहीं.)


तुम्हे तो चकाचौंद रौशनी प्यारी

मुझे तो बस वही अपनी मिटटी प्यारी

निर्मलता में कोई दाग नहीं, काश इतना समझ जाते

जो निर्मल है वही बेरंग हैं, काश इतना समझ पाते


(संदर्भ: मनुष्य को धन और धनवान का आकर्षण होता हैं. धन और धनवान की रौशनी की तरफ वो इस कदर आकर्षित होता हैं की किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. इससे बेहतर ये हैं की वो अपनी निर्मलता बनाये रख्खे लेकिन ये वो रौशनी से आकर्षित होने वाले नहीं समझते लाख समझाए इसी बात का मुझे रोना आता हैं.)


अमोल पाटखेड़कर

२६-जानेवारी-२०२३

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