Thursday, 12 December 2024

शून्य अस्तित्व

*शून्य अस्तित्व*


माहित असुनी तर्क आणि तत्वज्ञान

गुरफटतो निरर्थक पसारा सावरण्यात


चंचल मन विकार, करी भौतिक संचय

अधिकाधिकाचा मोह, नाशिवंत अनंत निग्रह


का पडलो वादविवादे, ओझे ज्ञानाचे फरफटले

न काही पदरी पडले, डोकेदुखी उफाळे


ब्रह्मदेव हसतो, किडेमुंग्या समजतो

क्षणभंगूर जगतो, काळ ब्रह्मदेवाचा सांगतो


न पेलू शके आपले आपण ओझे

सरणावर नेणारे चार खांदे दुसरे


शरीर जळले, मनही जळले असावे

राख माझ्या अस्तित्वाची, कोणी चिवडली कोण जाणे?


अस्तित्व माझे काय होते, आसक्तीने विचारले

ब्रह्मदेवा लेखी, उल्लेख माझा नसे


अमोल पाटखेडकर

१३-डिसेंबर-२०२४

Friday, 1 March 2024

चंद मिसरे

हसीं लम्हे ठहाके जोरो के 

छीनी मुस्कुराहटें गुजरते वक़्त ने


कुछ गलतिया मैंने भी की थी

नजरअंदाज़ बोहोतों ने की थी


बरी तो मैंने तुमको कबका कर दिया

गिला तो दिल मे कुछ नहीं रखा


कुछ यादे तुमसे ऐसी गढ़ी हैं 

जब भी लिखू जिक्र हो जाता हैं


कमाल के होते हैं वो लोग

दर्द भी सहते हैं और जिक्र भी नहीं करते


दूसरों के लिए आसान नहीं जनाब जलना

खुद को जल जाना पड़ता हैं


पहले जब हम मिलते थे मुस्कुराते थे

अब जब वो ही नहीं आँसू निकल आते हैं


किस्मत कुछ ऐसी थी मिल गए तुम सही वक़्त पर

न मिलते गर न जाने जिंदगी होती किस मोड़ पर


फ़िक्र हैं मुझे कहता नहीं हूँ

मेरे हर करम में तेरा भला चाहता हूँ


प्यार का इजहार जुबा ने न किया था

मगर आखों ने बतला दिया था


अधूरे ही सही रिश्ते तो थे

धुंदली ही सही यादे तो है


दुनिया कहती हैं तुम खो गए हो

एहसास मेरा हैं तुम मेरे पास हो


निभाने की चाहत तो बहोत थी 

छोड़ जाने वालों की कमी न थी


कहाँ ठहरा था वो मेरे लिए

साया बनके रुका तो नहीं मेरे लिए


नसीब से बेवजह मत उलझिए साहब 

नसीब से कम या ज़्यादा किसीको नहीं मिलता


दस्तक अवसर की सुन न पाए

मौकापरस्त बन न पाए


कोई दोस्त गैर न था मगर

तनहाई में हर शाम साथ निभाती थी


उलझी जिंदगी मकड़ी के जालमें

खोया सुकूँ सपनोंको सवारने में


होशियारी ने नादानी खो दी

रंगीं जिंदगी बेरंग हो गयी


वक़्त बढ़ता रहा लोग छूटते गए

आखों के आँसू सिमट से गए


चंद घडिया सिमटकर रखी थी सीने में

बिखरने का उनके वक़्त आ गया हैं


अमोल पाटखेड़कर

०२-मार्च-२०२४