Thursday, 6 July 2023

सामान्य

मरघट की वो लकड़ियाँ, मुज़पर हसीं

जलाया मुज़को लेकिन, वो जलीं

मिट्टी ने मुज़को, गले लगाया

नाकामियाबियोंका मेरे, शोर न मचाया


कुछ खबरे ऐसी सुनी, न सुनते जिन्हे तो अच्छा होता

चार दीवारों के अंदर, दो आसूं बहाये, कहाँ! ऐसा न होता तो अच्छा होता 

कभी ज्यादा घुटन हुई, शोक अपना दो दोस्तों में बांटा

कभी खून उबला, बस! अब नहीं सहा ज्याता बोला

इर्दगिर्द लोगों ने, समझा बुझाकर उसे ठंडा किया

ईसी नाकामियाबियों का सिलसिला, जिंदगी भर चलता रहा

अन्याय को बस, देखता सुनता रहा


जहर पीकर, मुहल्ले के किसानों ने, आत्महत्या की

कुछ हम उसका देना लगते हैं, भावना न जगी

बहु बेटियोंका, मानभंग हुआ

ज़मीर दहला, फिर भी चुप रहा

इतना तक नहीं किया, किसी जुलुस में मोमबत्ती जलाकर शोक प्रकट किया


कुछ शामे रंगीन थी, जो मायूसी पर परदा डालती थी

कुछ शामे हताश थी, रुलाकर ही छोड़ती थी

ऐसेही चलता था, ऐसेही चलता रहा, ऐसेही चलता रहेगा

सामान्य था, सामान्य रहा, सामान्य बनकर ही मर गया



अमोल पाटखेड़कर


Wednesday, 25 January 2023

क्रंदन

एक पटल विकार एक अविकार

दोनों की अपनी अपनी पहचान

दोनों असमंजस विरुद्ध

कौन तय करे कौन हैं बेक़सूर और कौन कसूरवार


(संदर्भ: यहाँ मनुष्य स्वभाव को पटल की उपमा दी हैं यह दर्शाने के लिए की मनुष्य भिन्न स्वभाव के होते हैं और उनकी अपनी अलग पहचान होती हैं. एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से मेल नहीं खाता - न रंग में, न रूप में, न स्वभाव में. कभी कभी मनुष्य अपने विचारों पर इतना अडिग होता हैं की उसको अन्य विचार सुनाई नहीं देते या उनको ग्रहण करने में वो असमंजसता दिखाता हैं. जो व्यक्ति हमारे विचारों से सहमत नहीं इसलिए वो बुरा हैं या जो हमारे विचारों से सहमत हैं इसलिए वो अच्छा हैं, ऐसा तय करना गलत हैं.)


मेरी करुणामय भावविभोर आवाज़े

क्षितिज से होके शुन्य से टकराके

तुम्हारे कानोंसे अनसुनी होके

आयी वापस लौट फेरा लेके


(संदर्भ: कभी कभी ऐसा भी होता हैं की जो बात हम दूसरों को समझाना चाहते हैं, उनके कानों तक तो पोहोचती हैं लेकिन बेअसर होकर दूसरे कान से निकल जाती हैं. माँ बाप छोटे बच्चों को जो समझाना चाहते हैं, वो बात बच्चे समझ नहीं पाते इस अर्थ से भी. जनरेशन गॅप की वजह से भी ऐसा होता हैं - यंग जनरेशन ओल्ड जनरेशन को सुनती नहीं हैं. जो आर्त पुकार भगवान् को हम लगाते हैं, वो भी सुनी नहीं जाती इस अर्थ से भी.)



ह्रदय में मेरे स्मृति की बस्ती

छलकाती आँसू कभी कभी 

नितल, निर्मल, बेरंग मेरे वो आँसू

लगते थे मगर तुम्हे मगरमच्छ के आँसू


(संदर्भ:एक मनुष्य दूसरे की भावनाये समझ नहीं पाता हैं और इसलिए उसे दूसरों की भावनाये झूटी या ड्रामा लगती हैं. इसका कारण हरएक की परिस्थिति, भावनाये और इमोशनल क्वोशन्ट अलग होता हैं. लोग एक ही परत या सेम वेवलेंग्थ पे नहीं होते हैं इसीलिए ऐसा होता हैं.)


शीतल ज्वाला को अनल बनाती मेरी गरम सांसे

जिसपर सपनों की रोटियां सेकी थी तुमने

डालकर जल; बुझा गयी मेरी, करुणार्द्र कहानी

मेरे करुणापटल पर अब बजती वीणा क्रंदन की


(संदर्भ: जो लोगों ने मुझे सीढी बनाके अपनी तरक्की की और फिर मुझे कचरा समझके त्याग दिया, ऐसे लोगों के बारे में सोचकर मेरा करूण ह्रदय रोता हैं, उनपर तरस खाता हैं.)


देता व्योम विस्तार, विस्तार व्योम तो नहीं

देता खुशबु मधुबन, मधुबन खुशबु तो नहीं

देती शीतलता कौमुदी, कौमुदी शीतलता तो नहीं 

देता मधुछत्ता मधुबुँदे, मधुबुँदे मधुछत्ता तो नहीं


(संदर्भ: जब मनुष्य ग़ुस्सेमे अनाब-शनाब बकता हैं तो क्या वो खुद अनाब-शनाब होता हैं? नहीं वो मनुष्य ही होता हैं. परिस्थिति के अनुसार हमारा बर्ताव बदलता हैं. इसका मतलब हम वो बर्ताव हैं ऐसा नहीं. किसी व्यक्ति को उसके कभी कभार किये हुए बर्ताव से पहचानना ये गलत हैं.किसी व्यक्ति को उसके बर्ताव के लिए जनम भर ताने मारना ये गलत हैं.  इससे बेहतर हैं की उस बर्ताव को भूल जाये मनुष्य को नहीं.)


तुम्हे तो चकाचौंद रौशनी प्यारी

मुझे तो बस वही अपनी मिटटी प्यारी

निर्मलता में कोई दाग नहीं, काश इतना समझ जाते

जो निर्मल है वही बेरंग हैं, काश इतना समझ पाते


(संदर्भ: मनुष्य को धन और धनवान का आकर्षण होता हैं. धन और धनवान की रौशनी की तरफ वो इस कदर आकर्षित होता हैं की किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. इससे बेहतर ये हैं की वो अपनी निर्मलता बनाये रख्खे लेकिन ये वो रौशनी से आकर्षित होने वाले नहीं समझते लाख समझाए इसी बात का मुझे रोना आता हैं.)


अमोल पाटखेड़कर

२६-जानेवारी-२०२३

Sunday, 22 January 2023

हुक्की

एकदा अक्षर रुसले, फारच फुगले 

म्हणे! मी स्वतःत काहीच नाही


मग शब्दाने अक्षराला जागवले

अस्तित्वच तुझ्याविना माझे नाही, समजावले


खुद्कन अक्षर हसले, पंगतीत शब्दांच्या बसले

मुळाशी शब्दांच्या मीच, विचारांती सुखावले


एकदा शब्दाला आली आपलीच किळस

म्हणे! मी स्वतःत काहीच नाही


मग वाक्याने त्याला समजावले 

म्हणे! अरे वेड्या, अर्थविहीन तुझ्याविना अस्तित्व माझे


शब्दा तुझी काय करू मीमांसा, विविधरंगी तू

कधी छटा विकारी, तर कधी अविकारी


जेंव्हा असतोस विकारी, बनुनी समोर येशी नाम, सर्वनाम, विशेषण 

जेंव्हा असतोस अविकारी , बनुनी समोर येशी क्रियापद


काय सांगू तुझी करामत, धरून मारून 'ध' चा 'मा' करून

शब्दाचा अनर्थ होई, चिकित्सा तुझी काय करू अजून


किती ओवाळू स्तुतीसुमने, विचारवंत तुझा पाठपुरावा करिती

शब्दकोष तुझे बनविती, कवी तुला सलाम करिती


शब्द एकच भाषा एकच, परंतु अनेक अर्थ देशी

तोच तू भाषा वेगळी, परंतु भिन्न अर्थ होशी


असे तुझे उज्ज्वल चरित्र, का करिसी अट्टाहास

तुझ्याविना मी अनाथ, सोडून दे स्व तिरस्कार


पटवून वाक्याने दिले, तेंव्हा शब्द मानले

रुसणे तेंव्हा हरले, गाली स्मितहास्य आले


मग एके दिवशी, हुक्की वाक्याला आली

रुसणे फुगणे मुसमुसण्याची, स्वतःला कमी लेखण्याची


मग एका विद्वानाने, वाक्याला समजावले

एकामागून एक येतोस तू, बोलीभाषा तुझी होते


ओझरतं वाक्ये येति लेखणीतून जेंव्हा, साहित्य तुझे होते

भावनांना शोधत येशी जेंव्हा, गीत तुझे होते


व्यासपीठावरील वक्त्यांचे, एकमेव शस्त्र तूच

प्रेम व्यक्त करणारा तूच, त्वेष आवेगातही तूच


हलत पान तुझ्याविना नाही, तू शब्दांचा जाणता;अक्षरांचा मानता

पर्याय दुसरा नाही, मी तुझ्याविना पोरका


अक्षर, शब्द, वाक्य एकाच माळेतले मणी, ईर्ष्या कसली एकमेकांशी

सुशोभित तुम्ही, आपापल्या स्थानी


अमोल पाटखेडकर

२३-जानेवारी-२०२३

Thursday, 19 January 2023

ताबा

मधुमेह वगैरे काही नाही, गाढवाला गुळाची चव नाही

मामला घृत-शर्करायुक्त साधा नाही, जिभेवर हाड नाही


परंतु दुप्पट खाणे, हळूहळू खिळवी अंथरुणी

अचाट खाणे, नेई मसण मार्गी


खाईन तर तुपाशी नाही तर उपाशी, मानत ऐसे नाही

करावी एकादशी येता चाळीशी, ऐसे जरुरी नाही


आधी पोटोबा, ऐसे तत्वज्ञान नाही

आपल्याच पोळीवर तूप, ओढून घेत नाही


आम्हाला आमचेच देऊ गहू, असला स्वार्थ नाही

कोथळा काढतो देऊन आवळा, ऐसी प्रवृत्ती नाही


लागला गोड ऊस म्हणून, खात मुळासकट नाही

ऊसाच्या उदरी कापूस, ऐसी दैना नाही


त्याची वाजवावी टाळी, ज्याची मिळते पोळी

कर्म हेच मर्म, विश्वास अतूट नव्हे गर्व


आरोग्य हेच ऐश्वर्य, गुरुकिल्ली हीच आमुची

स्वेच्छेनेच खात काहीबाही नाही, सैल लगाम सोडत नाही

स्वत्व ममत्व सोडत नाही, सत्व उन्मत्त होत नाही 


अमोल पाटखेडकर

२०-जानेवारी-२०२३