Friday, 30 December 2016

क्या क्या पाया??.......

 बिती हुई गलिंयों से फिर गुज़रना मुझे मंजूर नहीं l भूतकाल के आइने में झांककर अपने ही चेहरे को फिर से देखना मेरा दस्तूर नहीं ll

     जो हुआ वो बीत गया
   पलों में उन; मैं जी भर जिया l
जो मिला, जैसा मिला, जिंदगी से मिला या और किसीसे मिला l मैनें हमेशा दिल खोलके सबका स्वागत किया ll

    जो गया उसका गिला नहीं l
    जो छूटा उसका शिकवा नहीं ll

 काली कलुटी रातों की कितनी भी हो घनघोर छाया l बाहर तो रहता ही रोज़ सुबह की धूप का उजाला l अन्दर भी बहुत बार बुझे दियों को मैने जलाया ll

    मन की शक्ती को भीतर समेटकर l
  उजालों की राहों पर हमेशा चलकर l
 बीते हुए गीले शिकवों को भूलकर l
बीती हुई छोटी छोटी घडियों से सीख लेकर l
कल के सूरज की रोशनी का अरमान सीने से लगाया l आज का पल, आज की घडी, आज के दिन को अंतिम समझकर जीने का अंदाज पाया ll

खुशनसीब हूँ मैं जिन्होने मुझे जिंदगी को जिन्दादिली से जीना सिखाया l पत्थर को भी ठोकर लगाना सिखाया ll  काँटोंपर भी चलना सिखाया ll हिम्मतवाला बनाकर हिम्मत से काम लेना सिखाया ll

किसी भी परिस्थिती में डंटकर मुकाबला करना सिखाया ll नाकामयाबी में भी कामयाबी की ओर जाना सिखाया ll हर हाल में मुझे उन्होने मुस्कुराना सिखाया ll

   और क्या क्या बताऊँ दोस्तों तुम्हें l
  मेरे माँ बाप से मैनें क्या क्या पाया l
    कुछ खोया नहीं आजतक,
     सबकुछ पाया ll
उन्होने ही तो मेरी जिंदगी को खुशनुमा बनाया l उन्होने ही तो मेरी जिंदगी को खुशनुमा बनाया ll

   मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.

        ३०/१२/२०१६.

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