यादों की दिलेरी में गाँव का घर कहीं ना कहीं
वापसी के लिए मुसाफिर पैर निकलेगा नहीं
चाहे छोटासा घर ही है वहां सही
अपनेपन का एहसास कहीं और मिलेगा नहीं
घर तो आखिर घर ही होता है, खुशी खजाना यहीं
दिल की बात, रुहानीं जज्बा कहीं और नहीं
यादों की दिलेरी में गाँव का घर कहीं ना कहीं
मृदुला मुकुंद पाटखेडकर
२८ जुलै २०२२

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