दर्द की रेशाये सिमट जाये, तरकीब कोई ऐसी नहीं होती
चमक उठे किस्मत, साजिश कोई ऐसी नहीं होती
नवजवान पढ़ालिखा, हाथ लगी बेरोजगारी
संवेदना; वेदना, उम्रभर नसीहते साथ रही
मंदिरों की सीढिया घिसाई, नंगे पैर चलके
ग्रहों के स्थान मगर नहीं सुधरे , कुंडली में मेरे
कुछ कर गुजरने की चाह मे, कुछ सिक्के हाथ लगे
मरने तो नहीं दिया मगर, ख्वाहिशों के ढेर लगे
कभी रखे कदम फूँक फूँक कर, पैर फिर भी छील गए
मन्नते बोहोत मांगी मगर, असर उसके नाकाम हुए
कामयाबी, नाकामयाबी एक ही सिक्के के दो पहलु हैं
नामाकूल, नाकामियाब होना; बेगैरियत तो नहीं है
कभी नाकमियाबी को सहारा देकर, कामियाबी की तरफ ढ़केलकर देखो
जहाँ में जन्नत का एहसास, यही तो हैं
अमोल पाटखेड़कर
२९-अक्टूबर-२०२२
No comments:
Post a Comment