Thursday, 6 July 2023

सामान्य

मरघट की वो लकड़ियाँ, मुज़पर हसीं

जलाया मुज़को लेकिन, वो जलीं

मिट्टी ने मुज़को, गले लगाया

नाकामियाबियोंका मेरे, शोर न मचाया


कुछ खबरे ऐसी सुनी, न सुनते जिन्हे तो अच्छा होता

चार दीवारों के अंदर, दो आसूं बहाये, कहाँ! ऐसा न होता तो अच्छा होता 

कभी ज्यादा घुटन हुई, शोक अपना दो दोस्तों में बांटा

कभी खून उबला, बस! अब नहीं सहा ज्याता बोला

इर्दगिर्द लोगों ने, समझा बुझाकर उसे ठंडा किया

ईसी नाकामियाबियों का सिलसिला, जिंदगी भर चलता रहा

अन्याय को बस, देखता सुनता रहा


जहर पीकर, मुहल्ले के किसानों ने, आत्महत्या की

कुछ हम उसका देना लगते हैं, भावना न जगी

बहु बेटियोंका, मानभंग हुआ

ज़मीर दहला, फिर भी चुप रहा

इतना तक नहीं किया, किसी जुलुस में मोमबत्ती जलाकर शोक प्रकट किया


कुछ शामे रंगीन थी, जो मायूसी पर परदा डालती थी

कुछ शामे हताश थी, रुलाकर ही छोड़ती थी

ऐसेही चलता था, ऐसेही चलता रहा, ऐसेही चलता रहेगा

सामान्य था, सामान्य रहा, सामान्य बनकर ही मर गया



अमोल पाटखेड़कर


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