बाहर
कितनी
भी
धूप
हो
l
मेरे
मन
के
अंदर
छाँव
है
ll
शांती
का
बसे़रा
है
l
उन्नती
का
सवे़रा
है
ll
निराशाओं
के
खेल़
में
l
आशाओं
का़
मेल
है
ll
मेरे
मन
की
गंगा
धारा़
l
पुनीत,
निर्मल,
पावन
है
ll
बाहर
कितनी
भी
धूप
हो
l
मेरे
मन
के
अंदर
छाँव
है
ll
सच्चाई
से
भरी
जिंदगी
l
बेईमानी
मालूम
नहीं
ll
बूँद
बूँद
पसी़ने
की
सिंचाई
l
सोच़
में
भी
न
आयी
कभी़
l
जिंदगी
से
बेवफाई
ll
बाहर
कितनी
भी
धूप
हो
l
मेरे
मन
के
अंदर
छाँव
है
ll
वक्त
वक्त
की
बात
है
l
कल
तक
था
अंधेरा
छाया
l
आज
रोशनी
का
दिया
जलाया
ll
बाहर
कितनी
भी
धूप
हो
l
मेरे
मन
के
अंदर
छाँव
है
ll
खुद
को
जो
अच्छी
लगी
राह
l
उसीपर
पाँव
रखने
की
चाह
l
बाहरी
गर्मियों
की
क्यों
करुँ
मै
परवा़ह
l
मन
का
चैन
और
सुकून
ढूँढे
हमेशा
मेरी
निगा़ह
ll
बाहर
कितनी
भी
धूप
हो
l
मेरे
मन
के
अंदर
छाँव
है
ll
मृदुला
मुकुंद
पाटखेडकर.
३
जून
२०१७.
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