Saturday, 3 June 2017

मेरा मन....मेरा मन....


बाहर कितनी भी धूप हो l

मेरे मन के अंदर छाँव है ll

 

शांती का बसे़रा है l

उन्नती का सवे़रा है ll

निराशाओं के खेल़ में l

आशाओं का़ मेल है ll

 

मेरे मन की गंगा धारा़ l

पुनीत, निर्मल, पावन है ll

 

बाहर कितनी भी धूप हो l

मेरे मन के अंदर छाँव है ll

 

सच्चाई से भरी जिंदगी l

बेईमानी मालूम नहीं ll

 

बूँद बूँद पसी़ने की सिंचाई l

सोच़ में भी आयी कभी़ l

जिंदगी से बेवफाई ll

 

बाहर कितनी भी धूप हो l

मेरे मन के अंदर छाँव है ll

 

वक्त वक्त की बात है l

कल तक था अंधेरा छाया l

आज रोशनी का दिया जलाया ll

 

बाहर कितनी भी धूप हो l

मेरे मन के अंदर छाँव है ll

 

खुद को जो अच्छी लगी राह l

उसीपर पाँव रखने की चाह l

बाहरी गर्मियों की क्यों

करुँ मै परवा़ह l

मन का चैन और सुकून

ढूँढे हमेशा मेरी निगा़ह ll

 

बाहर कितनी भी धूप हो l

मेरे मन के अंदर छाँव है ll

 

मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.

जून २०१७.

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