अजीब सी भागदौड है
ये जिंदगी
फिर भी तू जी ले
जी भर के
हँस ले जी भर
के
रोते रहना तेरी फितरत
नहीं
सोये रहना तेरी आदत
नहीं
दुःखों को पार कर चलते
चलते
मंजिल तो मिल ही
जायेगी कहीं ना कहीं
सुख का सागर ढुँढने
से नहीं मिलता
अंतर्मन में खोज
ले तू उसे यहीं
तेरा स्वर्ग भी यहीं
तेरा चैन भी यहीं
धुप भी यहीं
छाँव भी यहीं
धुप छाँव की आँख मिचौली
से बचके कोई जा सकता नहीं
धुप में रहकर ही
ढुँढनी है तुझे तेरी छाँव यहीं यहीं....यहीं....
यहीं.....यहीं
तेरा सबकुछ ही है
यहीं
तेरा कमाया हुआ अच्छा
नाम रहेगा यहीं
जिंदगी से फिर भी तू
जायेगा कहीं
तेरे अच्छे काज ही
तेरे साथ आयेँगे
यही बात पते की
यही है बात सही......!!!
मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.
२९ सप्टेंबर २०१६.
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