पूरे
दिन
की
कायनात
दिल
की
गहराईयों
में
डूबने
को
है
अभी
शाम़
होने
को
है
वो
पंछियों
की
चव़चवा़हट
वो
पत्तों
का
हिलना
वो
झरनों
का
गिरना
वो
सम़न्दर
की
लहरें
धीरे
धीरे
धीरे
धीरे
थोडी़
देर
ठहरने
को
है
अभी
शाम
होने
को
है
वो
काफि़ला....
यादों
का
हो...
या
इन्सानों
का
वो
यादें....
सुखभरी
हो.....
या
दुखभरी...
दिन
ढलते
ही
शाम
होते
ही
पता
नहीं
क्यों
आँखों
में
नमीं
सी
आने
को
है
अभी
शाम
होने
को
है
वो
परछाईयाँ
उम्र
के
साथ
चलनेवाली
वो
कश्ती़
बचपन
की
वो
जवानी
दिवानी
सी
दिन
और
रात
के
बीच
का
ये
सफर
शाम़
का
चाहे
ये
सफ़र
हो
उम्र
की
शाम़
का
शाम़
रंग
में
रंगता
हुआ
लगे
ऐसे
ढलने
को
है
अभी
शाम
होने
को
है
अभी
शाम
होने
को
है
अभी
शाम
होने
को
है
मृदुला
मुकुंद
पाटखेडकर.
१४/११/२०१७.
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