Tuesday, 14 November 2017

अभी शाम होने को है


पूरे दिन की कायनात

दिल की गहराईयों में डूबने को है
 

अभी शाम़ होने को है


वो पंछियों की चव़चवा़हट

वो पत्तों का हिलना

वो झरनों का गिरना

वो सम़न्दर की लहरें

धीरे धीरे धीरे धीरे

थोडी़ देर ठहरने को है

 
अभी शाम होने को है

 
वो काफि़ला....

यादों का हो...

या इन्सानों का

वो यादें....

सुखभरी हो.....

या दुखभरी...

दिन ढलते ही

शाम होते ही

पता नहीं क्यों

आँखों में नमीं सी आने को है

 
अभी शाम होने को है

 
वो परछाईयाँ

उम्र के साथ चलनेवाली

वो कश्ती़ बचपन की

वो जवानी दिवानी सी

दिन और रात के बीच का

ये सफर शाम़ का

चाहे ये सफ़र हो

उम्र की शाम़ का

शाम़ रंग में रंगता हुआ

लगे ऐसे ढलने को है

 
अभी शाम होने को है

अभी शाम होने को है

अभी शाम होने को है

 

मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.

१४/११/२०१७.

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