Friday, 20 October 2017

वो अब क्या कर रही होगी?


   रोशनी से रोशन इस जहाँ को

  स्वर्ग जैसा महसूस करती होगी

 

  सूक्ष्म रुप में हर घर जा रही होगी

   नयन उसके सुकोमल, कजरा़रे

  सच्चा वैभवशाली ढूँढ रही होगी

 

   वो अब क्या कर रही होगी?

 

   चपल, चंचल उसकी शुभ काया़

  अमावस की रात में वो मिट्टी का दि़या

  दिपों की दिपमाला से सजी ये दुनिया

   देख वो!!!....कहाँ कहाँ ठहरती होगी

 

   कमलाक्षी, कमलप्रिया श्रीलक्ष्मी वो

 घर घर को स्नेहभाव से जोड़नेवाली

 गृहलक्ष्मी में खुद का वजूद तलाशती होगी

 

   वो अब क्या कर रही होगी?

 
    कनक, मोती, हिरे, और....

      पैसे ढेर सारे.....

   जाने कहाँ कहाँ फिरौती होगी

 

     वो अब क्या कर रही होगी?

     वो अब क्या कर रही होगी?

 

   मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.

 

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