Thursday, 7 December 2017

मौत की जुबा़नी


जी़ रहा है ना तू....

जहाँ तू वहाँ मैं....

 

जनम़ ज़नम से

युगों युगों से

जीव का जीवित

सत्य मैं

अंतिम यात्रा़ में

अंतिम समय आनेपर

हर किसोको, कहीं से भी

उठानेवाला अंतिम सत्य मैं

जी़ रहा है ना तू....

जहाँ तू वहाँ मैं....

 

फुलों के संग रहने़वाला

काँटा हूँ मैं

जी़वन वृक्ष की हर शाख़ को

काँटता हूँ मैं

 

सर्प के साथ़ चलनेवाला

विष हूँ मैँ

चाहे कितना भी कड़वा लगे

विष का प्याला पिलानेवाला

कड़वा सच हूँ मैं

 

जी़ रहा है ना तू....

जहाँ तू वहाँ मैं....

 

अभ़य लेकर चलता हूँ

भस्म़ कभी नहीं होता

उध्वस्त कभी नहीं होता

जीवन नैया़ को किनारोंपर

लाने का इंतजार हूँ मैं

 

जी़ रहा है ना तू....

जहाँ तू वहाँ मैं....

 

मेरे आगे झुकते सभी

मेरे पास रुकते सभी

मौत की कहानी

मौन की जुबा़नी

जी़ रहा है ना तू....

जहाँ तू वहाँ मैं....

 

चलते चलते

हँसते हँसते

आते जाते

सोये जागते

तेरे द्वार पर दस्तक देकर

दस्तूर निभानेवाला मैं

 

जी़ रहा है ना तू....

जहाँ तू वहाँ मैं....

 

मेरा उग़म कहाँ पर....

और कहाँ मेरा गंतव्य है

बस्स!! इतना समझ ले प्राणी...

मेरा रुप भव्य और विशाल है

जी़ रहा है ना तू....

जहाँ तू वहाँ मैं....

फिर से नयी जिंदगी आयेगी

फिर से नयी दुनिया बसेगी

फिर से पल़ हरपल़ गुजरेगा

पल़क झपकते ही...

फिर से दुनिया का

जीवन वृक्ष अंकुरित होगा

फल़ लगेंगे फूल खिलेंगे

सुख-दुःख की छाँव में

जिंदगी बसर करेंगे

मर मिटकर फिर से आनेवाला

आश्वस्त हूँ मैं....

 

जी़ रहा है ना तू....

जहाँ तू वहाँ मैं....

 

शुरुआत है तो अंत भी होगा

अंत नहीं तो शुरुआत नहीं

शुरुआत नहीं तो अंत नहीं

आनेवाले को जाना ही पडे़गा

फिर चाहे किसीका नाम

'अमर' क्यों हो??....

अजर अमर तो मैं हूँ

ना व्यथित हूँ

ना त्रस्त हूँ

 

जी़ रहा है ना तू....

जहाँ तू वहाँ मैं....

 

मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.

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