Monday, 7 November 2016

अज़नबी

    अजनबी की तरह आते है सभी
       इस दुनिया में
     अजनबी बनकर रहते है

     जन्म लेते है जब इस दुनिया में
      तो लगता है हर कोई नया
       दिखता है हर कोई नया
       समझ जब आने लगती
         तब पता चलता के
       बहोत प्यार करनेवाले
          माँ बाप होते है
       बचपन में साथ खेलनेवाले
      साथ साथ पढाई करनेवाले
       बहन भाई होते है
    स्कूल या कॉलेज में जाते है जब
     तब बहोत सारे दोस्त मिलते है
      कुछ अर्से के बाद वो भी दूर
        चले जाते है
    जो आज एक दूजे को पहचाननेवाले
     कल एकदम बेगाने हो जाते
     बिल्कुल अजनबी की तरह
      विश्वास ही नहीं होता उन
    दिनों का जब याद आते है दोस्त
 जिनके बिना हम कभी रह नहीं सकते थे
     आज कैसे रह लेते है?

        जैसे जैसे उम्र बढती
      रास्तों की राह भी बदलती
     मंजिलों की तलाश बदल जाती
      खूबसूरत दिखता कोई एक
       तो शादी हो जाती
      जिंदगी की डोर अब जीवनसाथी
       के हाथ में रह जाती
    सारी उम्र बच्चों का भविष्य संवारने
     में  ही निकल जाती
    अपनों की खुशी में ही खुद की खुशी
       दिखने लगती
     कभी अन्जान, अजनबी की तरह
      लगनेवाली ये दुनिया अब
      जानी पहचानी हो जाती
     क्योंकी उम्र के साथ रिश्ते भी
       बढते ढेर सारे
     कभी जो बिल्कुल ही पराये थे
     आज अपने लगते कितने सारे

   सब के साथ रिश्ते निभाते निभाते
    सब के साथ हाथ मिलाते मिलाते
    ये हाथ छूट जाते है दूर कहीं
      चला जाता है जब इनमें से
         कोई एक दूर कहीं
   जिसका पता किसीको मालूम नहीं
     एक जाता है दूर तो उसके पीछे
     एक एक जाता है उसी पथ पर
     जहाँ दिखता है आखिरी रास्ता
    चाहे कितना भी दो जानी पहचानी
     प्यारी सी इस दुनिया का वास्ता
    लेकिन कुछ फायदा नहीं होता
   आनेवाले को एक दिन जाना ही पडता
    चाहे कुछ भी हो जाये आखिरी रास्ता
    कभी नहीं छुटता, किसी की नहीं सुनता
     कभी अजनबी सी थी ये दुनिया
      अब फिर से बेगानी हो जाती
      कुछ निशान नहीं छोडती किसीके
     सबके दिलों में यादों की बारात
      लेकर आती, बुंद बुंद बनकर
       आँसु आँसुओं में समा जाती
      ऐसे वक्त दुनिया के लिए वो
      अजनबी होता और उसके लिए
    पूरी दुनिया ही अजनबी बन जाती
       मेला लगता रिश्तों का
       मेला लगता दोस्तों का
       जब तक होती है जान
      खूबसूरत लगता है जहा़न
     फिर भी बनकर रह जाता
    इस दुनिया में हर कोई अन्जा़न
       हर कोई अन्जा़न
     अजनबी की तरह आते है सभी
       इस दुनिया में
     अजनबी बनकर रहते है

     मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.

        नोव्हेंबर २०१६.

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