उम्र गुजरती
जा रही
उनके खयालों
में
जहान बदल
रहा
फिजा ने
रुख बदला
मौसम बदलता
जा रहा
कई कलियों
ने घूँघट खोले
लेकिन इस दिल
ने मेरे
न जाने
क्यों कुछ राज़
नहीं खोले
ये दिल
है के मानता
ही नहीं
उनकी यादों
से निकलता ही
नहीं
सपनों में रोज़
वो आते रहे
दिल की
गहराईयों में झाँकते
रहे
धीरे धीरे
ही सही
मुझे अपने
वो लगते रहे
मशहूर जिंदगी ने
घेर लिया था
उन्हे
प्यार करनेवालों का
हाल कैसे होता
है
ये कुछ
भी समझ में
ही न आया
उन्हे
इसलिए होठों की
बात होठों पर
ही रही
दिल की
बात दिल में
ही रही
इशारों से फिर
भी कुछ उन्हे
समझा ही
नहीं
ये दिल
है के मानता
ही नहीं
उनकी यादों
से निकलता ही
नहीं
दिन बितने
लगे खयालों में
रात की
नींद खो गयी
खयालों में
जाग जागकर
उनके खयालों में
क्या पाया
क्या खोया समझा
ही नहीं
मुहाब्बत तो मेरी
सोयी रही हमेशा
जिक्र कभी भी
किसीसे, कहीं भी
हमने किया
ही नही, कभी
भी नहीं
ये दिल
है के मानता
ही नहीं
उनकी यादों
से निकलता ही
नहीं
मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.
१२ नोव्हेंबर
२०१६.
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