Saturday, 5 November 2016

चुभन

      एक अजीब सी चुभन दिल में
        की़ल बनकर चुभ रही
     गम जिंदगी़ में शोभा बनकर
      रह रही ..... राह गुजर कर रही

       जहाँ जहाँ भी जाऊँ मैं
       जिधर कहीं भी देखूँ मैं
     ये रंजो़गम पिछा छोडता ही नहीं
       कोहरा मचा है गम का इतना
     धुआँ धुआँ सा उठा गम का इतना के,
     रास्ता बिल्कुल साफ़ दिखता ही नहीं

     कितना भी अच्छा बर्ताव करो
      हर किसीसे.....
   कितनी भी मदद करने की कोशिश करो
    किसी किसी को... कहीं भी कभी भी
     क्या कहीं अच्छाई की दुनिया
     रही ही नहीं, कहीं भी नहीं

      जो कोई भी मिलता जिंदगी में
     लगता है मुझे ऐसा की उसे
     प्यार की भाषा मालूम ही नहीं
   क्या प्यार की बोली समझती ही नहीं

  टकरा जाते है किसी किसी के कडवे बोल
  घाव बनकर, चुभन बनकर, कितनी बार
     बार.... बार इस दिल पर
        रौंदते खडे़ होते है
      समझ में ही नहीं आता
       क्या करुँ क्या नहीं

        दर्द देने की कोशिश की
       किसीने मेरी भावनाओंको
      पलटकर रख दिया मेरे मन का
         तख्त़ और ताज़
      ताजा ताजा जख्मों का घाव
       तो भरता नहीं जल्दी कहीं
      सुना है, इन्सानियत तो रहती
      इस दुनिया में यहीं कहीं
       यहीं कहीं, यहीं कहीं

    मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.

       नोव्हेंबर २०१६.

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