Saturday, 22 October 2016

किसने देखा?

     'आज' ही पूरा नहीं मालूम; फिर.... !!
     'कल' किसने देखा है???....... !!

   इस अन्जानी राहों पे तनहाई का डेरा है
   तनहाई में भी जीने की आदत डालनी है
   बस्स!! बस्स!!... इसके लिए आप
   सभी के साथ की जरुरत है; हाँ, हाँ
    सभी के साथ की जरुरत है
    'आज' ही पूरा नहीं मालूम; फिर.... !!
     'कल' किसने देखा है???....... !!

     दिल, जिंदादिली से जीने की
      तुझे आदत है
    अच्छा कुछ कर गुजरने की चाहत है
    बहुत कुछ काम करने को बाकी है
  बहुत कुछ उतार-चढाव आनें को बाकी है
     'आज' ही पूरा नहीं मालूम; फिर.... !!
      'कल' किसने देखा है???....... !!

     खुशी के पलों में समा जाना है
     दर्द की आहों में भी समान रहना है
      ये शायरी कहती मै तेरे साथ हूँ
      ये कविता कहती मै तेरे साथ हूँ
      ये कलम कहती मै तेरे साथ हूँ
      ये परिवार कहता हम तेरे साथ है
      ये तनहाई कहती; मुझे तो अब
      भाग ही जाना है........ !!
    मेरा तो अब यहाँ कोई ठिकाना नहीं है
      'आज' ही पूरा नहीं मालूम; फिर.... !!
       'कल' किसने देखा है???....... !!

   मन में भावनाओं का आज लगा है मेला
डरती हूँ कभी कहीं रहना ना पडे अकेला
    देखती हूँ जब चार दिवारों के बाहर
    देखती हूँ जब इस दुनिया को;
 समझने की कोशिश करती हूँ दुनिया को
 तो लगता है इस दुनिया में हर कोई अकेला
     'आज' ही पूरा नहीं मालूम; फिर.... !!
     'कल' किसने देखा है???....... !!

      तनहाई के जैसे रहते राज कई
   जिंदगी जीने के भी वैसे; रहते राज कई
    दिल, इस राज को तुझे जानना है
      जीने के तरीके को समझना है
    मायूसी, तनहाई के पलों पर भी राज
     तुझे करना है..... !! तुझे ही करना है
      तुझे ही राज करना है..... !! 
    'आज' ही पूरा नहीं मालूम; फिर.... !!
     'कल' किसने देखा है???....... !!

      
    मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.

        २२/१०/२०१६.

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