Wednesday, 12 October 2016

जिंदगी

    कदम कदम पर वो मिलती मुझे
    हर डगर पर हौसला देती मुझे
    कहती है मैं दोस्त हूँ तेरी
      मिल जा मुझे
     हाथ में हाथ रख मेरा
     हर पल साथ दे मेरा
     हमेशा कहती वो मुझे
     ये फूल भी तेरे दोस्त है
    ये पेड भी तेरे दोस्त है
    ये पंछी भी तेरे दोस्त है
    ये सूरज भी तेरा दोस्त है
    ये चाँद भी तेरा दोस्त है
     धूप भी तेरी दोस्त है
    छाँव भी तेरी दोस्त है
    ये पशु भी तेरे दोस्त है
    ये प्राणी भी तेरे दोस्त है
    पुरी कायनात को दोस्त मानती तू
    जिक्र करती उनका तेरी कविताओंमें
     आज मुझे भी तू अपना मान ले
     आज मुझे भी तू दिल से लगा ले
     जुडी हूँ मै बचपन से तेरे साथ
    खेली हूँ मै लेकर हाथों में तेरा हाथ
    बनीं मै कभी तेरे सपनों की दुल्हन
     खुलके जब हँसती थी तू
    दिल से जब बोलती थी तू
    खुद से ही जब बातें करती थी तू
     कभी वो बातें सुख की
     कभी वो बातें दुःख की तेरी
     इन्हीं से सजाया मैने तेरे मन का आँगन
        रुठा ना करो तुम कभी मुझसे
        पता है मुझेकभी कभी
        दौर आता ऐसा जब
        कोई रास्ता नहीं दिखता
      जब कोई मंजिल नहीं मिलती
       अपनों का साथ छूटता है
       कोई घाव ऐसा मन को छू लेता है
       कोई डगर ऐसी जिसमें काँटें चुभते
       कोई नजर ऐसी जिसमें तू चुभती
       क्या करुँ मै?? क्या करुँ मै
 फिर भी तेरे साथ रहने की कोशिश करती
 फिर भी तेरे साथ जीने की कोशिश करती
      सबके साथ रहती हूँ मै
      सबका साथ देती हूँ मै
      नजर नजर और नजरिए की बात है
        कोई मानता मुझे पहेली
        कोई मानता मुझे सहेली
       मै एक ही बार आती हूँ
        आती नहीं दोबारा
           मै हूँ जिंदगी
           मै हूँ जिंदगी
       मान ले मुझे तू अपना मितवा
    निभा ले साथ मेरा तू बनके यार मेरा

    मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.

      १२ अॉक्टोबर २०१६.

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