कदम कदम
पर वो मिलती
मुझे
हर डगर
पर हौसला देती
मुझे
कहती है
मैं दोस्त हूँ
तेरी
आ मिल
जा मुझे
हाथ में
हाथ रख मेरा
हर पल
साथ दे मेरा
हमेशा कहती वो
मुझे
ये फूल
भी तेरे दोस्त
है
ये पेड
भी तेरे दोस्त
है
ये पंछी
भी तेरे दोस्त
है
ये सूरज
भी तेरा दोस्त
है
ये चाँद
भी तेरा दोस्त
है
धूप भी
तेरी दोस्त है
छाँव भी
तेरी दोस्त है
ये पशु
भी तेरे दोस्त
है
ये प्राणी
भी तेरे दोस्त
है
पुरी कायनात
को दोस्त मानती
तू
जिक्र करती उनका
तेरी कविताओंमें
आज मुझे
भी तू अपना
मान ले
आज मुझे
भी तू दिल
से लगा ले
जुडी हूँ
मै बचपन से
तेरे साथ
खेली हूँ
मै लेकर हाथों
में तेरा हाथ
बनीं मै
कभी तेरे सपनों
की दुल्हन
खुलके जब हँसती
थी तू
दिल से
जब बोलती थी
तू
खुद से
ही जब बातें
करती थी तू
कभी वो
बातें सुख की
कभी वो
बातें दुःख की
तेरी
इन्हीं से सजाया
मैने तेरे मन
का आँगन
रुठा ना
करो तुम कभी
मुझसे
पता है
मुझे; कभी
कभी
दौर आता
ऐसा जब
कोई रास्ता
नहीं दिखता
जब कोई
मंजिल नहीं मिलती
अपनों का साथ
छूटता है
कोई घाव
ऐसा मन को
छू लेता है
कोई डगर
ऐसी जिसमें काँटें
चुभते
कोई नजर
ऐसी जिसमें तू
चुभती
क्या करुँ
मै?? क्या करुँ
मै
फिर भी
तेरे साथ रहने
की कोशिश करती
फिर भी
तेरे साथ जीने
की कोशिश करती
सबके साथ
रहती हूँ मै
सबका साथ
देती हूँ मै
नजर नजर
और नजरिए की
बात है
कोई मानता
मुझे पहेली
कोई मानता
मुझे सहेली
मै एक
ही बार आती
हूँ
आती नहीं
दोबारा
मै हूँ
जिंदगी
मै हूँ
जिंदगी
मान ले
मुझे तू अपना
मितवा
निभा ले
साथ मेरा तू
बनके यार मेरा
मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.
१२ अॉक्टोबर
२०१६.
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