Tuesday, 25 October 2016

आँखे

     कितना भी छुपाके देख लो
     कितना भी देखकर अनदेखा कर लो
      देखा है मैने तुझे
      देखा है मैनै तुझे
      कहती ये आँखे
      देखती ये आँखे

      कभी बनती काफि़र यही आँखे
      कभी बनती इशारे यही आँखे
       सुख में भी यही आँखे
       दुःख में भी यही आँखे
    सुख के आये आँसुओं में भी यही आँखे
 
      समा लेती है समा को यही आँखे
      चुभती है किसीको यही आँखे
     चुरा लेती है अखियाँ यही आँखे
      अँखियोंके झरोंकों से देख लेती है
        बहोत कुछ यही आँखे

     शब्दों की जहाँ जरुरत नहीं होती
 अल्फाज जहाँ कम, और फिके पडने लगते
      कुछ छुपाना पडता है औरों से
         कुछ बताना नहीं होता,
          चार लोगों के सामने
     तब, बोलती है, बताती है, और सबकुछ
       बयाँ करती है यही आँखे
   
      सच्चे लोगों की सच्ची आँखे
      झूठे लोगों की झूठी आँखे
      फरेबीयों की फरेबी आँखे
   बदला लेनेवालों की लगती बदली आँखे
    मुँह छुपानेवालों की लगती चोर आँखे दिल से चाहनेवालों की लगती प्यारी आँखे
      भोले लोगों की भोली आँखे
      ज्ञानी लोगों की चमकती आँखे
    पराक्रमी लोगों की तेज तर्रार आँखे
     बुरी नजरवालों की बुरी आँखे
    होती है हर एक की जैसे फितरत
     बनती है वैसे ही यही आँखे
      बडी जादूई होती है यही आँखे
     
      कितना भी छुपाके देख लो
     कितना भी देखकर अनदेखा कर लो
      देखा है मैने तुझे
      देखा है मैनै तुझे
      कहती ये आँखे
      देखती ये आँखे

   मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.
    २५ अॉक्टोबर २०१६.

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