Sunday, 9 October 2016

वो भी क्या दिन थे

   वो भी क्या दिन थे
  पापा और हम साथ थे
  पापा कहानियाँ सुनाते थे
   राजा, रानी, महाभारत,
   रामायण, शिवाजी, और
   अली बाबा चालीस चोर की
   मन लगाकर सुनते थे हम
   कहानियों में रहती थी
   बात पते की
 
   वो भी क्या दिन थे
  हर सुबह बनती थी
  पापा के गानों से सुरीली
  अलग अलग गानें गाकर
  वो भी झुम उठते थे
   और हम भी
   वो भी क्या दिन थे
   वो भी क्या दिन थे

   चित्र निकालते थे वो सुंदर
   बिल्ली, शिवाजी और बंदर
   मिट्टी से बनाते थे वो
   रंग लगाकर; अलग अलग
   फल सुंदर
   रहते वो अपनी ही मौज में
    जैसे हो मस्त कलंदर
     वो भी क्या दिन थे
     वो भी क्या दिन थे

    'ये रात, ये चाँदनी फिर कहाँ
      सुन जा दिल की दास्ताँ'
      ये गाना गाते थे वो हमेशा
      लगता जैसे सुना रहे हो
      खुद के जीवन की दास्ताँ
       वो भी क्या दिन थे
       वो भी क्या दिन थे

     बजाना भी उनको आता था
      तबला, पेटी और बाँसुरी
       जब भी देखूँ मै ये सारे
        याद आती उनकी पुरी
         वो भी क्या दिन थे
         वो भी क्या दिन थे

       बच्चे रहते भविष्य कल का
       बनें आगे कुछ ना कुछ
       बनें अच्छे इंसान वो
       सींचा उसने बीज को हमारे
      मेहनत और मशक्कत करके
      बातें की उन्होने हमसे बहुत कुछ
        वो भी क्या दिन थे
        वो भी क्या दिन थे

      जिंदगी के इस खेल में
      सामना करो डंटकर
     हार न मानो तुम कभी हार कर
     कोशिश करते रहो अपने बलपर
      आगे ही आगे चलते रहो
      इस जीवन पथ पर
    संदेश दिलाया उसने ये
       जी जानकर
     वो भी क्या दिन थे
     वो भी क्या दिन थे
  
     इतरा रहा है आज वर्तमान
         उस भूतकालपर
     कह रहा है आ अब लौट चल
     पुरानीं यादों का ताज रहता
        हमेशा हमपर
    छाया रहती इसकी हमेशा
      हमारे आज पर
   संजो के रख तू इसको और
     आगे की बात कर.......!!
    
    
   मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.

      ९ अॉक्टोबर २०१६.

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