जीवन एक नैय्या है
बैठता इसमें हर
कोई
मंझधार में आता
जब
देखता सपने हर कोई
बुनता सपने हर कोई
ढूँढता सपने हर
कोई
कभी सपने आगे जाने
के
कभी सपने अमीर बनने
के
कभी सपने शादी के
कभी सपने बच्चों
के भविष्य के
कभी सपने माँ, बाप
के उम्मीदों के
कभी सपने दुःख
के
कभी सपने सुख
के
कभी सपने अपनों
के
कभी सपने परायों
के
इसी में चलती जीवन
की नैया
जीवन की नैया चलती
इसी में
कभी कभी ही खुश
रहता हर कोई
कभी कभी ही मिलता
सुख
संतुष्टता में
ही मानना पडता सुख
वरना तो वो मिलेगा
नहीं
ढुँढने से वो
मिलता नहीं
कोई ऐसा नहीं मिलेगा
जो ये कहेगा
जा!! जा!! सुख है
वहीं
ठिकाना उसका तो
रहता नहीं
कभी कहीं, कभी
कहीं
दुःख तो मिलेगा
हर जगह
दुःखी तो दिखेगा
हर कोई
सुख और दुःख के
तराजू में
दुःख का पलडा पडता
भारी
दुःख से ही हमेशा
करनी पडती यारी
इससे उलझने की
तैयारी करनी पडती
पूरी
इससे उलझते उलझते
जिंदगी निकल जाती
पूरी
यहाँ वहाँ जहाँ
तहाँ
देखे सपने हर
किसीने
बुने सपने हर
किसीने
ढुँढे सपने हर
किसीने
पर ऐ दिल, जीवन
की इस नैया में
सुख दुःख की आँख
मिचौली में
सपनों की रची दुनिया
में
हमेशा दूर किनारा
रहता!!!
दूर दूर किनारा
रहता!!!
हमेशा दूर किनारा
रहता!!!
मृदुला मुकुंद पाटखेडकर.
१० अॉक्टोबर २०१६.
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